
जोधपुर। अध्याय मंच की त्रैमासिक श्रृंखला ‘रचनात्मक रविवार’ के अंतर्गत आयोजित साहित्यिक कार्यक्रम में शहर के युवा एवं वरिष्ठ साहित्यकारों ने प्रख्यात साहित्यकार डॉ. हरीदास व्यास की साहित्यिक यात्रा से प्रेरणा लेते हुए मंच संचालन तथा गद्य लेखन की बारीकियों को विस्तार से समझा। कार्यक्रम दो सत्रों में आयोजित किया गया, जिसमें युवा रचनाकारों की प्रस्तुतियों के साथ-साथ साहित्य, लेखन और मंच संचालन पर गहन विमर्श हुआ।
कार्यक्रम संयोजक चंचल चौधरी ने बताया कि कार्यक्रम के प्रथम सत्र की शुरुआत 11 युवा लेखकों के गद्य लेखन पाठ से हुई। इस सत्र में रंजना भाटी, रिंकल जैन, सुरभि खीची, सूरज सोनी, निमिषा व्यास, अनुपमा, स्वाति पुरोहित, सुरभि सारस्वत, निधि व्यास एवं कुलदीप सिंह भाटी ने अपनी-अपनी लघुकथाओं का प्रभावशाली पाठ किया। युवा रचनाकारों की प्रस्तुतियों को उपस्थित साहित्यकारों एवं श्रोताओं ने सराहा।
द्वितीय सत्र से पूर्व अध्याय के संस्थापक कल्याण के विश्नोई ने डॉ. हरीदास व्यास की साहित्यिक एवं सृजनात्मक यात्रा पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने अपने पत्रवाचन के माध्यम से डॉ. व्यास के साहित्यिक जीवन के अनेक अनछुए पहलुओं से श्रोताओं को परिचित कराया। इस दौरान उनकी साहित्यिक उपलब्धियों, विभिन्न पुरस्कारों एवं सम्मानों के साथ-साथ अब तक प्रकाशित सभी पुस्तकों पर भी विस्तार से चर्चा की गई।
दूसरे सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए डॉ. हरीदास व्यास ने मंच संचालन और गद्य लेखन की बारीकियों पर विस्तार से अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि “मंच संचालक किसी भी कार्यक्रम का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग होता है, फिर भी कार्यक्रम की खबरों में उसका नाम सबसे अंत में लिखा जाता है। मंच संचालक आयोजक जितना ही महत्वपूर्ण होता है, लेकिन कार्यक्रम के बाद उसे बहुत कम तवज्जो मिलती है, जबकि वह कार्यक्रम की नींव की ईंट होता है। यदि कोई व्यक्ति इस कम तवज्जो में भी संतुष्ट रह सकता है, तभी उसे मंच संचालन करना चाहिए।”
उन्होंने कहा कि मंच संचालन एक अत्यंत संवेदनशील कला है। मंच संचालक द्वारा बोले जाने वाले प्रत्येक शब्द का चयन कार्यक्रम की प्रकृति और गरिमा के अनुरूप होना चाहिए। गलत शब्दों का प्रयोग कार्यक्रम की गरिमा को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने कहा कि मंच पर जाने से पहले संचालक को आयोजक से भी अधिक जानकारी एकत्र करनी चाहिए, ताकि वह कार्यक्रम को प्रभावी ढंग से संचालित कर सके और परिस्थितियों के अनुसार उसे आगे बढ़ा सके।
गद्य लेखन पर अपने विचार रखते हुए डॉ. व्यास ने कहा कि अच्छा पाठक बने बिना कोई भी अच्छा लेखक नहीं बन सकता। एक अच्छे पाठक के भीतर हमेशा एक अच्छे कहानीकार की संभावना छिपी रहती है। उन्होंने कहा कि लेखक को अपने लिखे हुए को खारिज करना भी आना चाहिए। कई बार पहली बार लिखा गया साहित्य केवल अभ्यास होता है। यदि लेखक उसे छोड़ने का साहस रखता है, तो आगे और बेहतर लिखने के रास्ते खुलते हैं।
उन्होंने कहा कि एक अच्छे लेखक में अपनी ही कहानी को कथानक बदले बिना अलग-अलग शैली में पुनः लिखने की क्षमता होनी चाहिए। पहली बार लिखी गई रचना को अंतिम मान लेना उचित नहीं है, क्योंकि प्रारंभिक लेखन कई बार केवल स्वांतः सुखाय होता है, जबकि पुनर्विचार और पुनर्लेखन से वही रचना अधिक परिपक्व और प्रभावशाली बन सकती है।
डॉ. व्यास ने कहा कि लेखक को अपने लिखे हुए के आनंद में अवश्य डूबना चाहिए, लेकिन उसमें अटकना नहीं चाहिए। उसे अपने लेखन से बाहर निकलकर स्वयं को स्वतंत्र करना भी आना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब लेखक के सामने चुनौतीपूर्ण परिस्थितियां आती हैं, तब उसे उनके उत्तर अपनी कल्पनाशक्ति में खोजने चाहिए और उन्हीं अनुभवों एवं कल्पनाओं को कहानियों का रूप देना चाहिए। उन्होंने कहा कि साधना केवल आध्यात्मिक क्षेत्र की नहीं होती, बल्कि अन्य सभी विधाओं की तरह लेखन का भी मूल आधार साधना ही है।
कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार एवं शायर पद्मश्री शीन काफ़ निज़ाम, हबीब कैफ़ी, डॉ. पद्मजा शर्मा, चाँदकौर जोशी, बसंती पंवार, नीना छिब्बर, सत्येन्द्र छिब्बर, आशा पाराशर, डॉ. रेणुका श्रीवास्तव, राकेश मूथा, डॉ. मनीषा डागा, दशरथ कुमार सोलंकी, कमलेश तिवारी, डॉ. आर.एस. राठौड़, प्रमोद वैष्णव, सूरज माहेश्वरी, रेणु वर्मा, संतोष चौधरी, मधुर परिहार, शालिनी गोयल, डॉ. तृप्ति गोस्वामी, मनशाह नायक सहित बड़ी संख्या में वरिष्ठ एवं युवा साहित्यकारों तथा साहित्य प्रेमियों ने भाग लिया।
कार्यक्रम के अंत में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. पद्मजा शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए अध्याय मंच की पूरी टीम को सफल एवं सार्थक आयोजन के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा कि ऐसे कार्यक्रम साहित्यिक संवाद को नई दिशा देने के साथ-साथ युवा रचनाकारों के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शन का महत्वपूर्ण माध्यम बनते हैं।
